स्वर्गीय बाबू केशव सिंह जी- एक शख्सियत…बेशुमार

सांसारिक जीवन में शून्य से शिखर की यात्राएं ही प्रसिद्धि पाती हैं। लेकिन, शिखर से शून्य की यात्राएं अंतस की गहराइयों का प्रतिबिंब बनकर जब झलकती हैं तो जीवन का सार भी नजर आता है और दुनियादारी का बाजार भी। इसलिए भी कि उन गहराइयों में कहीं कुछ छिपा हुआ, कहीं कुछ दबा हुआ। कहीं कुछ बिखरा हुआ। कुछ उलझा हुआ। कुछ सुलझा हुआ। बहुत कुछ होता है।
सुनने के लिए, सुनाने के लिए। समझने के लिए, समझाने के लिए। सीखने के लिए, सिखाने के लिए। सबक के लिए, प्रेरणा के लिए भी। ऐसी ही एक शख्सियत की कुछ कही-अनकही दास्तां, जो अपने आप में बेशुमार थी और… बेमिसाल भी। नाम-बाबू केशव सिंह। कहते हैं जिंदगी की चाल कोई समझ पाए, ऐसा मुमकिन नहीं। बात सही भी है, जीवन के सफर में कब कहां क्या हो जाए, किसी को पता नहीं। जीवन का आधा से अधिक सफर ऐश्वर्य और वैभव में कटा। उसके बाद का जीवन संघर्षों की दस्तावेज बन गया।
लेकिन, दोनों काल खंडों में एक समानता थी, जो सबसे महत्वपूर्ण है; वह थी निष्छलता, निर्भीकता और दृढ़ता। उस दौर में जब इलाके में बड़े जमींदार के रूप में प्रसिद्धि थी तब भी और जब जीवन ने संघर्षों की राह चुनी तब भी, कोई हिचकिचाहट नही।ं कोई घबराहट नहीं। दिखावटी, बनावटी चेहरों को कभी तरजीह नहीं दी। तब भी जब हाथ बहुत तंग हो गए थे। कदम दर कदम परेशानियों का अंबार था। जो लोग कभी मदद के लिए शरणागत हुआ करते थे। उनकी अहसानफरामोशी की भी कभी परवाह नहीं की। गुजरते जीवन के साथ बस चलते चले गए। बिना रूके, बिना थके।
किसी से न कोई अपेक्षा का भाव न उपेक्षा का। आत्मबल इतना सशक्त कि उन्हें किसी और का मोहताज होने नहीं दिया। यह कोई साधारण बात नहीं। इसके पीछे सांसारिक अनुभवों की पाठशाला तो थी, उससे कहीं अधिक कारगर भूमिका थी उनके आध्यात्मिक लगाव की। काशी के सुविख्यात संत श्री छोटेजी महाराज के अनन्य प्रिय बाबू केशव सिंह वर्ष 1981 में उनके सानिध्य में आए। गुरुजी उन्हें अतिस्नेह से कहा करते थे, देखो हमारे हनुमान आ गए। गुरुजी तक उन्हें पहुंचाने का सेतु बने उनके कुलपुरोहित पंडित मोलईजी महाराज। गुरुजी से उनके मिलन का प्रसंग भी बेहद अद्भुत था।
संत के पास जाने के लिए अनुनय-विनय का मानस होना चाहिए। शिष्यत्व ग्रहण करने के लिए। लेकिन, क्षत्रिय कुल और फिर बड़े जमींदार होने के नाते जो स्वाभाविक गुण होते हैं, वो सब तो थे ही। मिजाज में सख्ती और निर्भीकता तो जन्म से ही भरपूर थी। इससे पहले कभी किसी दरबार में शीश नवाया नहीं था। संत का हृदय कितना सरस और कितना सरल होता है, इसे देखिए कि गुरुजी ने उन्हें उनके स्वभाविक गुणों के साथ अपनाया। तब गुरुजी के शिष्यों में देश की कई नामचीन शख्सियतें शुमार थीं।
लंबे-चौड़े ओहदे वालों, राजनीतिज्ञों, महात्माओं, साधुओं-संन्यासियों से काशी के नेमीजनों तक, तब ऐसा कौन रहा होगा जिसे गुरुजी के दर्शन कर कृतार्थ होने की लालसा नहीं थी। गुरुजी वर्ष भर में सिर्फ गुरु पूर्णिमा के दिन किसी एक कृपा पात्र को दीक्षा देते थे। यह परंपरा पहली बार टूटी थी, जब बाबू साहब अपने पूरे कूनबे को साथ लेकर सिद्धाश्रम आए। दया-कृपा क्या होेती है, देखिए। गुरुजी ने उनके पूरे परिवार के तकरीबन दर्जन भर से अधिक सदस्यों को एक साथ दीक्षा दी। तब कुछ शिष्यों ने कहा था, यह परंपरा के अनुरूप नहीं है।
गुरुजी ने उन्हें समझाया था, यही हरि इच्छा है। हरि की इच्छा कैसे टल सकती है। आध्यात्मिक जीवन की उन्नति का सफर यहां से जो शुरु हुआ, वह फिर जीवनपर्यंत थमा नहीं। गुरुजी के सानिध्य में आने के बाद पूजा-पाठ में रुचि बढ़ी। आज के दौर में यह जानकर किसी को भी हैरानी हो सकती है कि अस्सी के दशक में शिवपुर-खैरवां ही नहीं, आसपास के गांवों से नाते-रिश्तेदारों तक अभिवादन की भाषा बन गया, श्रीराम। प्रणाम, नमस्कार यह सब पीछे छूट गए थे। एक-दूसरे से मिलने पर बस श्रीराम का अभिवादन। यह समरसता किसी जाति या समाज तक सीमित नहीं थीं।
हर जाति-हर वर्ग के लोग एक-दूसरे को श्रीराम कहते थे। वर्ष 1984 में गुरुजी का देहावसान उनके लिए बड़ी निजी क्षति थी। उस पर एक के बाद एक कभी सूखे की मार तो कभी पारिवारिक परेशानियां। जितनी लंबी-चौड़ी खेती, उतना ही लंबा-चौड़ा संयुक्त परिवार। उतनी ही लंबी-चौड़ी जिम्मेदारियां। आय का स्रोत सिवाय खेती-किसानी के और कुछ नहीं। एक तरफ विपरीत होती परिस्थितियां और दूसरी तरफ बढ़ती जिम्मेदारियां। तमाम तरह की मुश्किलों के बावजूद हर एक जिम्मेदारी को बखूबी निभाने की उनकी कोशिश का कोई मिसाल नहीं था।
कई बार ऐसा हुआ कि जिम्मेदारियों के लिए जमीन भी बेचनी पड़ी। लेकिन, बेची भी तो अपने नाम की। परिवार के अन्य सदस्यों के हिस्से की एक इंच भी जमीन कम नहीं होने दी। उन्होंने उन सभी जिम्मेदारियों को उनके मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाया, जो उनके पिता स्वर्गीय बाबू श्री मारकंडेय सिंह जी ने उन्हें विरासत में सौंपी थी। सांसारिक जीवन की तरह उनके आध्यात्मिक जीवन का चक्र भी समय की परिधि में घूमा। वर्ष 1988 में परम संत सद्गुरु आचार्य श्री प्रेमनाथ सरस्वती स्फोटायन जी महाराज के रूप में उन्हें एक ऐसा संबल मिला, जिसकी उपलब्धता कभी कम नहीं हुई।
संतश्री की दया-कृपा ने उन्हें अपना दास बनाया। दास की एक मात्र आस गुरुजी ही थे। यह उस वक्त हुआ जब परेशानियों का घेरा कसता जा रहा था और इन सबके बीच पारिवारिक खींचतान भी सतह पर आने लगी थी। यह उस दौर की शुरुआत थी, जिसके बाद मुश्किलों का अंत कहीं नहीं था। कुछ रह गया था तो सिर्फ गुरुजी की दया-कृपा का सहारा। यह ऐसा सहारा था, जिसके बिना जीवन की संपूर्णता नहीं होेती। यहां भी गुरुजी का स्नेह उन पर अथाह था। गुरु के रूप में ही नहीं, सांसारिक अर्थों में सच्चे अभिभावक और संरक्षक के रूप में भी। इसे गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की विनय पत्रिका से संदर्भित करें तो ‘तोहि मोहि नाते अनेक मानिए जो भावे’, गुरु-शिष्य का संबंध इन अपरिमित भावों जैसा ही था।
जब साथ कोई नहीं था। जीवन हाशिए पर आ चुका था। तब यदि कुछ पास था, साथ था तो बस एक थे गुरुजी। जब गुरु यानी साक्षात ईश्वर जिसके साथ हों तो और किसी की जरूरत ही कहां रह जाती है। समय के साथ बहुत कुछ चीजें बदलीं लेकिन जो बदला नहीं, वह था गुरुदेव महाराज के प्रति उनका अटूट विश्वास। इस विश्वास ने उनके जीवन को उन संभी रंगों से परिपूर्ण किया, जो बहुत बिरले ही नसीब होता है। धन-दौलत, मान-बड़ाई तो हासिल करने वाले बहुत मिल जाएंगे लेकिन ऐसी अक्षय संपत्ति का हकदार वही हो सकता है, जिस पर परमात्मा की कृपा हो।
पारिवारिक बिखराव के बीच वक्त की करवट कभी आईने पर धूल की तरह जमी तो कभी बर्फ की तरह हाथों से फिसलती चली गई। लेकिन, शख्सियत पर कभी कोई आंच आई हो, ऐसा नहीं हुआ। वही बेखौफ और बेबाक अंदाज। हमेशा एक जैसा और दूसरों के लिए सर्वथा समर्पित। खुद के लिए कभी किसी तरह का कोई संग्र्रह नहीं। जीवन को बस एक सामान्य जीवन की तरह प्रवाहमय बनाए रखने का उनका जज्बा ठीक वैसा ही था, जैसा परिस्थितियों के आगे कभी किसी तरह हार न मानने की उनकी जिद। परिस्थितियों से लड़े और कभी लड़खड़ाए भी लेकिन साहस कभी कमजोर पड़ा हो, ऐसा नहीं हुआ।
मुश्किलें आती रहीं, जाती रहीं। हालात बनते और बिगड़ते रहे। सुख-दुख की परछाईं भी साथ-साथ चली। कभी अपने बेगाने हुए तो कभी वक्त का हाथ थामकर मुसीबतें खिंची चली आईं। लेकिन, हौसले की आंधी ने परिस्थितियों की पेचीदगियों की कभी परवाह नहीं की। एक ही जीवन काल में वैभव का शिखर भी देखा और फकीरी का धरातल भी। वापसी का उत्कर्ष भी। कहते हैं न कि अंत भला तो सब भला।
आखिर वक्त ऐसा आया, जब परिस्थितियों ने उनके हौसले के आगे हार मान ली। संघर्षमय जीवन यश और तप-त्याग की कुछ कही-अनकही दास्तानों से होते हुए उस अनंत गहराई में समाहित हो गया, जहां आरंभ और अंत के बीच कोई अंतर नहीं। और यही वस्तुतः जीवन का सार सूत्र भी है। जहां आदि, मध्य और अंत सब एक हो जाएं। वही एक जो आदि भी है, मध्य भी है और अंत भी है। वही एक जो एक भी है, अनंत भी है। उनकी जीवन यात्रा में जो एक चीज सबसे प्रमुखता से थी, वह थी अपने अनन्य कृपा पात्र पर गुरुजी की दया-कृपा। जो अनंत थी। अथाह थी। हर तरफ थी। हर तरह से थी। भरपूर थी। बेहिसाब थी।
