ऐतिहासिक पंचकोसी तीर्थ परिक्रमा में हर कदम आस्था हर कठिनाई तप और हर पड़ाव आत्म शुद्धि की छांव
घनश्याम पाठक, वाराणसी। भक्ति की शक्ति और तप के ताप की दमक देखनी हो तो काशी के पंचकोसी तीर्थ आइए। यहां हर कदम आस्थाए हर कठिनाई तप और हर पड़ाव आत्म शुद्धि की छांव है। संयमए धैर्य और भक्ति का संदेश देने वाली यह ऐतिहासिक पंचकोशी तीर्थ परिक्रमा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और सेवा भाव की भी अनूठी विरासत है। पुरुषोत्तम में शुरू होने वाली पंचकोसी तीर्थ परिक्रमा में हर वर्ष हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं और लगभग 80 किलोमीटर की परिक्रमा पूरी करते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसारए जब काशीपुराधिपति भगवान विश्वनाथ ने काशी को अपना निवास बनाया तब इस पावन भूमि की सीमा पंचकोस निर्धारित की। श्रद्धालु पाँच दिनों तक काशी की परिधि में स्थित प्रमुख तीर्थों और मंदिरों के दर्शन करते हुए भक्तिए तप और संयम का पालन करते हैं। पंचकोसी यात्रा काशी की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है जो भारत की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत को संजोए हुए है। यात्रा के दौरान प्रशासन के साथ ही स्थानीय लोग श्रद्धालुओं के लिए भंडारेए पेयजल और विश्राम की व्यवस्था में समर्पित रहते हैं।
पंचकोसी यात्रा पांच प्रमुख पड़ावों से होकर संपूर्ण होती है। गंगा स्नानए बाबा श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद तीर्थयात्री संकल्प लेकर मणिकर्णिका से यह परिक्रमा शुरू करते हैं। फिर कर्दमेश्वरए भीमचंडीए रामेश्वरए शिवपुर और कपिलधारा में पड़ाव लेते हुए वापस बाबा विश्वनाथ के दर्शन.पूजन के साथ परिक्रमा विराम लेती है। आचार्य पंडित तारा शंकर पांडेय बताते हैं कि यह यात्रा स्वयं भगवान शिव द्वारा निर्धारित काशी मंडल की परिक्रमा है। पंचकोशी यात्रा करने से समस्त तीर्थों का पुण्य मिलता है। पापों का क्षय होता है। भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
काशीवास का फल मिलता है। पंचकोसी तीर्थयात्रियांे की सेवा और अनुष्ठान में समर्पित रहने वाले पंडित रमेश तिवारीए पंडित मदन मोहन मिश्रा और पंडित अभिषेक पाठक बताते हैं कि यह परिक्रमा केवल एक तीर्थ यात्रा नहीं बल्कि आत्मा की उस खोज का नाम है जो अंततः शिव में विलीन हो जाती है। आस्थाए तप और मोक्ष की यह अद्भुत यात्रा आधुनिकता के इस दौर में भी सनातन आस्था और परंपरा का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।
लगभग 80 किलोमीटर के पंचकोसी परिक्रमा की परिधि में मुख्य रूप से 108 देवालय आते हैंए जहां दर्शन.पूजन करते हुए तीर्थयात्री नंगे पांव कदम दर कदम आगे बढ़ते हैं। न पांवों में चूभने वाले कंकड़.पत्थर की परवाह न तेज धूप और गर्म हवाओं की। जुबां पर हर.हर महादेव का जयघोष और मन आराधना.उपासना में तल्लीन। आस्था और भक्ति की छांव तले पूरी परिक्रमा बाबा विश्वनाथ की कृपा से संपन्न हो जाती है।
पंचकोसी के पांच पड़ाव
पहला पड़ाव है कर्दमेश्वर महादेव। यहां कर्दमेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। यह शिवालय कर्दम ऋषि द्वारा स्थापित है। पास में कर्दम कुंड भी है। पंचकोसी तीर्थयात्रियों का पहला रात्रि विश्राम यहीं होता है। दूसरा पड़ाव है भीमचंडी। यहां मां चंडी का शक्तिपीठ है। यहां देवी और शिव दोनों की उपासना होती है। इस शक्तिपीठ की स्थापना की मान्यता पांडवों से जुड़ी है। तीसरा पड़ाव है रामेश्वर महादेव। यहां रामेश्वर महादेव मंदिर है। यह पंचकोसी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। भगवान राम ने लंका विजय के बाद यहां वरुणा नदी के किनारे रामेश्वर महादेव की स्थापना की थी। चौथा पड़ाव है शिवपुर। यहां पांचों पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंगों की मान्यता है। तीर्थ यात्रियों के लिए यह विश्राम और पूजन का प्रमुख स्थान है। पांचवां और अंतिम पड़ाव है कपिलधारा। यह कपिल मुनि की तपोस्थली मानी जाती है। यहां कपिलेश्वर महादेव का मंदिर है।
भारतीय पंचांग और सनातन धर्म में अधिक मास का विशेष महत्व है। यह अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी मास माना गया है। यह मास लगभग हर 32 महीने 16 दिन बाद आता है और इसे चंद्र वर्ष तथा सौर वर्ष के बीच उत्पन्न अंतर को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है। पंचकोसी तीर्थ परिक्रमा पौराणिक काल से चली आ रही है। यह साधनाए भक्ति और आत्मशुद्धि का मार्ग है। पुरुषोत्तम मास में यह परिक्रमा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
-पंडित अनूप तिवारीए पुजारी, रामेश्वर महादेव मंदिर
