Friday, February 27, 2026
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यूजीसी बिलः ऐसी उलझन की जरूरत क्या थी

जातीयता की खेमेबंदी तोड़ने की पिछले दस वर्षों की दमदार कोशिशों को लगा तगड़ा झटका
यूजीसी बिल पर तो कोई न कोई निर्णय आ ही जाएगा लेकिन भरोसे पर लगी चोट भरेगी कैसे

घनश्याम पाठक, कार्यकारी संपादक, परफेक्ट मिशन

यूजीसी बिल 2026 ने भाजपा सरकार के सामने ऐसी उलझन खड़ी कर दी है, जिसे सुलझना कतई आसान नहीं है। यह ऐसी उलझन है, जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। विरोधी ताकतों की तमाम कोशिशों के बावजूद सब कुछ कमोबेश सही चल रहा था, सरकार के स्तर पर भी और संगठन के स्तर पर भी। लेकिन, चाहे-अनचाहे रूप् में यह एक ऐसी उलझन उठ खड़ी हुई है, जिसके लपेटे में सिर्फ सरकार नहीं, संगठन भी है। संगठन और हिंदुत्व की विचारधारा का मजबूत आधार डगमगाया सा है। जातीयता की खेमेबंदी को तोड़ने की पिछले दस वर्षों की मोदी सरकार की दमदार कोशिशों के लिए तो यह बहुत ही बड़ा झटका है।

राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और विकसित भारत, जहां जाति-धर्म नहीं भारतीयता हमारी पहचान बने, इसके लिए जितनी मजबूत कोशिशें मोदी सरकार की रही हैं, वह इनसे पहले शायद कभी नहीं रहीं और सरकार की इन कोशिशों को सिर माथे लगाने की समूचे देश में ललक भी जगी।उसके सकारात्मक नतीजे सामने आए। अब जब इन कोशिशों को मूर्तरूप होते देखने का सबसे अच्छा समय है तो उस वक्त यूजीसी बिल का बवंडर ऐसा गदर मचाए हुए है कि वातावरण में हैरानी और असमंजस की धुंध के सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा है।

अब चूंकि यूजीसी बिल का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और अंतरिम तौर पर इस पर रोक भी लगाई जा चुकी है तो यह तय है कि देर सबेर इस पर कोई न कोई निर्णय आ ही जाएगा लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भरेासे पर जो चोट लगी है, उसकी भरपाई किसी तरह हो पाएगी। इसलिए कि सवर्ण समाज की यह नाराजगी सिर्फ यूजीसी बिल को लेकर है, ऐसा नहीं है। शुरुआत तो एससीएसटी एक्ट ने ही कर दी थी। उसके बाद एक-एक कर सिलसिला चला।

कभी किसी ने सवर्ण समाज से जुड़ी जातियों के लिए अपशब्द कहे तो किसी ने उनके अस्तित्व और वजूद को ललकारा। सरकार या संगठन के जिम्मेदारों ने लंबे समय से चल रहे इस सिलसिले को नजरंदाज किया तो भी सवर्ण समाज सिर्फ यह मानकर खामोश रहा कि जहां राष्ट्रधर्म और राष्ट्र निर्माण का उद्देश्य हो वहां ऐसे छोटे-छोटे विषयों पर प्रतिक्रिया या नाराजगी उचित नहीं है। इसी बीच आए यूजीसी बिल ने उनके धैर्य की सीमा पार कर दी।

समानता, समावेशन और भेदभावमुक्त वातावरण के नाम पर जिस तरह से सवर्णों को भेदभाव और असमानता की खाईं में डालने की यह कोशिश हुई, उसने उनके भरोसे को हिला दिया। यह वही भरोसा है, जो दशकों से उन्हें भाजपा से और भाजपा को उनसे जोड़े रखे है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि सामाजिक, आर्थिक हालात के जिन आधारों को सरकार मानकर चल रही है, वास्तविक हालात अब बहुत अलग हैं।

सवर्ण, ओबीसी, एससी, एसटी का जो दायरा है, वह जाति के आधार पर ठीक हो सकता है लेकिन सामाजिक और आर्थिक हालात के आधार पर यदि इसे विभाजित किया जाए तो एक अलग ही तस्वीर उभरकर सामने आएगी। ओबीसी तो छोड़िए, एससी-एसटी कैटेगरी में आने वाले ऐसे अनगिनत परिवार आपको मिल जाएंगे जिनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हैसियत लाखों सवर्ण परिवारों से बहुत बेहतर होगी। ऐसे ही सवर्ण परिवारों में लाखों परिवार ऐसे मिल जाएंगे, जिनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हैसियत इतनी भी नहीं कि वह ठीक से दो वक्त की रोजी-रोटी जुटा पाएं।

ससम्मान जीवन यापन कर पाएं। समानता के संवैधानिक अधिकार के बावजूद उनके लिए पहले से इतनी असमानताएं हैं कि वे चाहकर भी इससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। बावजूद इसके यदि जातियों के आधार पर शोषितों, वंचितों, पिछड़ों को विकास की मुख्य धारा में लाने के नाम पर यदि उनके लिए सरकार की तरफ से कदम उठाए जा रहे हैं तो इसका विरोध कब हुआ। कभी कोई विरोध नहीं। किसी को आगे बढ़ाया जाए, इसका कभी विरोध हो नहीं सकता लेकिन किसी को आगे बढ़ाने के नाम पर दूसरों को आगे ही न बढ़ने दिया जाए तो इसका विरोध होना लाजिमी है।

अब तक के कार्यकाल में मोदी सरकार ने इन सभी पहलुओं पर बहुत शानदार उपलब्धियां हासिल कीं। सबका साथ, सबका विकास के ध्येय वाक्य को धरातल पर उतारा लेकिन अचानक आए यूजीसी बिल ने ऐसी उलझन खड़ी कर दी कि अब उससे पार पाना सरकार और संगठन के थिंक टैंक के लिए चुनौती बन गया है। राष्ट्रवाद की विचारधारा को अहमियत दिए जाने के पक्षधर लोग मानते हैं कि सर्व समाज को साथ लेकर सबका साथ-सबका विकास का जो ध्येय है, उस पर ही आगे बढ़ा जाना चाहिए।

विकसित भारत के जिस मिशन को लेकर सरकार आगे बढ़ रही है, उसकी कामयाबी में हर एक भारतीय का साथ जरूरी है। इस नाते हर एक भारतीय के अधिकार की रक्षा हो, उसे उसके विकास का समुचित अवसर उपलब्ध हो, यह जरूरी है। ऐसा तभी होगा जब जातीयता की जगह भारतीयता को आगे बढ़ाने की कोशिश पूरी मजबूती से आगे बढ़ेगी। यह देश के लिए जरूरी है, हर जाति-धर्म के लिए जरूरी है। राष्ट्र के लिए एकजुटता से बढ़कर कुछ नहीं। राष्ट्रविरोधी ताकतें अपने मकसद में कामयाब न होने पाएं, इस पर सजगता बेहद अहम है।

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