बिल की खामियों का विरोध बहुत जरूरी मगर इसके राजनीतिक नफा-नुकसान के मकसद को भी समझते रहिए
सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम रोक, यूजीसी का अस्तित्व समाप्त कर भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का गठन आवश्यक
घनश्याम पाठक, कार्यकारी संपादक, परफेक्ट मिशन
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की हाल ही में जारी की गई नई गाइड लाइन चर्चाओं के केंद्र में हैं। इसे लेकर विरोध के स्वर जिस तरह मुखर हुए हैं। जिस तरह की नाराजगियों, विरोध प्रदर्शनों और चेतावनियों का सिलसिला शुरू हुआ है, वह काफी कुछ 1990 के दशक के मंडल कमीशन के बाद के हालात से मिलता-जुलता है। उस वक्त के विरोध प्रदर्शनों के बाद ऐसा पहली बार है, जब इसके विरोध का स्वर एकजुट है और उसकी नाराजगी का आलम सिर्फ शोशेबाजी तक सीमित नहीं बल्कि उसका जमीनी असर पहले से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।
अब सबसे समझने की बात यह है कि यदि यूजीसी बिल 2026 का मुख्य उद्देश्य ही समानता, समावेशन और भेदभाव मुक्त वातावरण सुनिश्चित करना है तो फिर यह विरोध क्यों। इसके पीछे का आधार क्या है। यदि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की मंशा उच्च शिक्षण संस्थानों को समानता, समावेशन और भेदभाव मुक्त बनाने की है तो इसे लेकर किसी को आपत्ति भला क्यों होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म, जाति का हो, वह तो यही चाहेगा कि जिस कैंपस में उसका बच्चा उच्च शिक्षा ग्रहण करे, कम से कम वहां तो उसे एक आदर्श वातावरण मिले।
फिर भी यदि इस नए बिल को लेकर आपत्तियां और विरोध के स्वर लगातार सामने आ रहे हैं तो ऐसा क्यों है, क्या यह समझने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। बिल्कुल होनी चाहिए। अब सवाल यह है कि यह समझने और समझाने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए। जाहिर है, उनकी ही होनी चाहिए जो यह नया बिल लेकर आए हैं और जिनका दावा है कि उन्होंने बहुत सोच-समझकर इसे लागू किया है। यदि उनकी सोच-समझ ऐसी है कि एक ही देश, एक ही कैंपस में वर्ग विशेष के आधार पर अलग-अलग मापदंड तय कर दिए जाएं।
समानता के नाम पर असमानता और भेदभाव का ढोल पीटा जाए तो ऐसे यूजीसी के औचित्य पर सवाल उठना लाजिमी है। आपको याद होगा, यह वही यूजीसी है जिसको जेएनयू में देश विरोधी नारों में पर कोई एतराज नहीं होता। सरकार पहले ही यूजीसी का वजूद समाप्त कर इसकी जगह भारतीय उच्च शिक्षा आयोग के गठन की बात कह चुकी है। यहां यह भी समझने की जरूरत है कि यह बिल किसी सरकार ने लागू नहीं किया है। यह यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की अपनी उपज है।
यूजीसी हालांकि सरकार के अधीन संस्था है, इसलिए सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती लेकिन यहां यह जानना जरूरी है कि यूजीसी की नीति-नियंताओं में कौन लोग हैं जो समरसता और समान अवसर के नाम पर भेदभाव और विद्वेष को हवा देने की कोशिश में हैं। यूजीसी को समाप्त कर भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का गठन कितना जरूरी है, यह बात शायद अब ज्यादा स्पष्ट हो रही है। यदि यही पहले हो जाता तो यह समझाना कठिन हो जाता कि सरकार ने ऐसा क्यों किया।
खासकर तब जब देश विरोधी ताकतें मजबूती से यह बात उठातीं कि यह सरकार तो सिर्फ पुरानी संस्थाओं की जगह नई संस्थाएं बनाकर उनकी स्वतंत्रता समाप्त कर रही है। तब अपने ही समाज के बुद्धिजीवी इस पर एक राय नहीं बना पाते लेकिन मौजूदा हालात ने बहुत कुछ आईने की तरह साफ कर दिया है। यूजीसी बिल पर विरोध के स्वर यूं ही मुखर नहीं हैं। जिम्मेदारों के स्तर पर बड़ी चूक हुई है। अब यह बिना किसी प्रायोजन के हुई है या जानबूझकर की गई है, यह तो नीति-नियंता ही जानें लेकिन इसकी भरपाई न तो उतनी सहज नजर आ रही है और न ही उतनी सपाट।
बिल के विरोध में खड़ी जमात कह रही है कि समानता का अधिकार सबके लिए है और यह सबके लिए होना चाहिए। क्या समानता के अधिकार को किसी जाति-वर्ग के खांचे तक सिमटाया जा सकता है। दूसरे के अधिकारों को समाप्त करके ही क्या किसी के अधिकार की रक्षा हो सकती है। किसी के अधिकार का अतिक्रमण जायज ठहराया जा सकता है। किसी को भयमुक्त बनाने के नाम पर किसी को भय और सांशत में डाल दें, यह कहां का संवैधानिक अधिकार है। रक्षा तो सबके अधिकार की होनी चाहिए। समानता का मतलब ही सबसके लिए एक समान। भय और पक्षपात किसी के भी साथ हुआ तो समानता का मतलब कहां रह गया।
इन तमाम दलीलों के पीछे सबसे बड़ी वजह वो आशंकाएं हैं, जो इन नियमों के दुरुपयोग से जुड़ी हैं। ये आशंकाएं गलत भी नहीं हैं। पूर्व में लागू किए गए नियमों मंडल कमीशन से एससीएसटी एक्ट तक में ऐसी आशंकाएं न जाने कितनी बार सही साबित हुईं लेकिन उनकी रोकथाम केलिए कोई प्रभावी पहल नहीं हुई। नतीजतन, आज भरोसा इतना डगमगाया हुआ है कि यह मुद्दा अस्तित्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यूजीसी बिल पर फिलहाल रोक लगा दी है।
इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणियां की हैं, वो बेहद अहम हैं। बावजूद इसके, यूजीसी के नीति-नियंताओं की करतूतों के छींटे तो सरकार पर पड़ेंगे ही लेकिन यहां यह ध्यान रखा जाना सबसे जरूरी है कि यह विषय सिर्फ विरोध का नहीं सजगता का भी है। यूजीसी बिल की खामियों का विरोध बहुत जरूरी है लेकिन इस विरोध पर सियासत का रंग न चढ़ने पाए, यह भी उतना ही जरूरी है। इसलिए कि यह बिल विधान सभा चुनाव के पहले यूं ही नहीं थोपा गया है। इसके राजनीतिक नफा-नुकसान के मकसद को भी जरूर समझते रहिए। क्योंकि इस बिल के पीछे छिपे लोगों का असल मकसद भी शायद इसी के इर्द-गिर्द छिपा हो।
