सोनभद्र। जहां सड़कें खत्म हो जाती हैं, मोबाइल नेटवर्क गायब हो जाता है और स्कूल की छुट्टियों के साथ बच्चों की पढ़ाई भी थम-सी जाती है—वहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफ़र, जिसने काग़ज़ के छोटे से पोस्टकार्ड को किताबों से भरे झोले में बदल दिया। यह सफ़र न सिर्फ किताबों का था, बल्कि सपनों, भरोसे और सीख की निरंतरता का भी।
विकास खंड चोपन के अंतर्गत सलईबनवा, तेलगुड़वा, निंगा, कुकरबंदी और बघमनवा जैसे दुर्गम अतिपिछड़े आदिवासी गांवों के बच्चों ने पहली बार चिट्ठी देखी। टीम द्वारा जब उन्हें चिट्ठियों की कहानियां सुनाई गईं, तो बच्चों की आंखों में कौतूहल और मुस्कान एक साथ चमक उठी।
उपक्रम एजुकेशनल फाउंडेशन, डाला द्वारा संचालित झोलाछाप पुस्तकालय के माध्यम से सर्दियों की छुट्टियों में एक अनूठी पहल की गई। दुर्गम आदिवासी और अतिपिछड़े क्षेत्रों में बच्चों को किताबों से जोड़ने के उद्देश्य से 170 बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण बाल साहित्य की पुस्तकें उनके घर-घर पहुंचाई गईं। केवल किताबें ही नहीं दी गईं, बल्कि कहानियां सुनाकर बच्चों के भीतर पढ़ने के प्रति रुचि भी जगाई गई।
संस्था के प्रबंधक अंकित मौर्य बताते हैं कि जहां सड़कें नहीं पहुंचतीं और नेटवर्क नहीं मिलता, वहां किताबों से बच्चों को जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती है। यह केवल पुस्तक वितरण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास है, जिनके लिए किताबें अब तक स्कूल की चारदीवारी तक सीमित थीं।
उन्होंने बताया कि यह पहल संस्था के तरुण्य युवा कार्यक्रम के अंतर्गत सामाजिक पूंजी के सहयोग से युवाओं द्वारा संचालित की जा रही है। प्रथम बुक्स के सहयोग से बच्चों के लिए 25 पुस्तकों का सेट तैयार कर बुक झोला के रूप में वितरित किया गया। इस अभियान से अब तक 600 से अधिक बच्चे और समुदाय के सदस्य लाभान्वित हो चुके हैं।
संस्था की सह-संस्थापक एवं निदेशक किरण तिवारी बताती हैं कि जब स्कूल बंद रहते हैं और बच्चों के पास पढ़ने की सामग्री नहीं होती, तब सीखने की निरंतरता बनाए रखना सबसे बड़ी चिंता होती है। इसी सोच से पोस्टकार्ड के माध्यम से बच्चों को कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया, जिसका सकारात्मक असर अब दिखने लगा है। इस पहल से लगभग 450 बच्चों का जुड़ाव हो चुका है।
समन्वयक तूलिका और नूतन ने बताया कि दिसंबर से जनवरी के बीच इस पहल का दूसरा चरण शुरू हुआ, जिसमें कहानियां काग़ज़ के छोटे टुकड़ों से निकलकर पूरी किताबों का रूप लेकर 25 बच्चों तक पहुंचीं।
टीम सदस्य दिनेश और अवधेश बताते हैं कि पड़रछ ग्राम पंचायत के साधुबथान, ठुट्ठी सेमर, सरैया और पुरानचुंगी जैसे इलाके आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। न मोबाइल नेटवर्क, न पुस्तकालय और न ही नियमित शैक्षिक संसाधन।
जब उपक्रम की टीम पहली बार वहां पहुंची तो लोग संकोच में थे, कुछ बच्चे तीर-धनुष लेकर दूर भागने लगे। लेकिन जैसे ही किताबों से भरा झोला सामने आया और बताया गया कि यह बच्चों की पढ़ाई के लिए है, माहौल बदल गया। भय की जगह उत्सुकता ने ली और किताबें बच्चों की दोस्त बन गईं।
यह पहल केवल पुस्तकों का वितरण नहीं, बल्कि उस विश्वास का बीज है, जो दुर्गम जंगलों और पहाड़ियों के बीच भी सीख की रोशनी जला रहा है। पोस्टकार्ड से शुरू हुई यह यात्रा आज पुस्तक-झोले तक पहुंचकर साबित कर रही है कि अगर नीयत मजबूत हो, तो शिक्षा का रास्ता कहीं भी रुकता नहीं।
